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क्या है कांग्रेस की पॉलिटिक्स ?

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चुनाव आयोग ने देश की भविष्य की सरकार के चुने जाने की तारीखों का ऐलान कर दिया है,7 चरणों मे होने वाले इन चुनावों का परिणाम 23 मई को आएगा, और इसी के साथ यह बहस भी शुरू हो गई है कि सत्ता में कौन आएगा? तमाम सर्वे को गौर कर देखें तो भी क्या देश का विपक्ष राजनीतिक पिच पर बोलिंग करने की स्थिति में है? यानी 5 साल से सत्ता पर काबिज़ "बैट्समैन" नरेंद्र मोदी को आउट करने के लिए तैयार है? जो स्थिति विपक्ष और मुख्य तौर पर कहें तो कांग्रेस की है उसमे मौजूद बड़े बड़े नेता यह चाहते तो है कि नरेंद्र मोदी चुनाव हारें,मगर कैसे यह बताने से वो पीछे हट रहे है,मिसाल के तौर पर राहुल गांधी ने ऐलान कर दिया है कि वो "आप" से गठबंधन नही करेंगे,और अकेले 7 की सात सीटों पर चुनाव लड़ेंगे,राहुल गांधी ने शायद पुराने आंकड़े और मौजूदा हक़ीक़त पर गौर नही किया है,जिसमे उन्हें पिछले लोकसभा चुनावों और विधानसभा चुनावों में वहां ज़ीरो सीट मिली थी।इस बार भी बहुत हद तक कहा जा सकता है कि दिल्ली में कांग्रेस खाता भी न खोल पायें,यह तो दिल्ली की 7 सीट की बात है। उत्तर प्रदेश को देख लीजिए, वहां सपा और बसपा साथ...

मौके की नज़ाकत को समझते है अखिलेश यादव...

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बसपा सपा का गठबंधन उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिये फाइनल हो गया है,सपा जहाँ 37 सीटों पर चुनाव लड़ेगी,वही बसपा 38 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है,वही रालोद को 3 सीटें दे गई है,इतना ही नही आज ही एक खबर के अनुसार अखिलेश यादव ने कांग्रेस को 9+2 सीटों का ऑफ़र भी दिया है। इस खबर ने जैसे राजनीतिक हलके मे कोहराम मचा दिया है,क्योंकि इस "महागठबंधन" के फाइनल होने को स्थिति में वोटों का बिखराव खत्म हो जाएगा। इस "महागठबंधन" को अमली जामा पहनाने में जो सबसे ज़्यादा कोशिश की जा रही है वो अखिलेश यादव की है। अखिलेश यादव ने वक़्त की नज़ाक़त को बखूबी समझा है,वो जानते है और समझते है 2019 के लोकसभा चुनाव में हार का मतलब क्या हो सकता है। उन्हें पिछले तीन चुनावों से अच्छा प्रदर्शन न करने वाली बसपा को बराबर की सीटें दे दी है,और यदि कांग्रेस भी इस गठबंधन में आती है तो इस "महागठबंधन" से उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। लेकिन एक तबका ऐसा भी है जो यह कह रहा है कि अखिलेश गलत कर रहे है,उन्हें झुकना नही चाहिए,वो उत्तर प्रदेश में मज़बूत है,और अखिलेश यादव खुद ...

राहुल गांधी का "नेता" बन जाना ....

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2013 की बात है आज से लगभग 5 साल पहले की गोवा में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी जिसमे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित करते हुए,भाजपा ने अपने तुर्प का इक्का चल दिया था,और तब से लेकर तकरीबन 4 साल तक नरेंद्र मोदी ने वो करके दिखाया जो भारतीय राजनीतिक इतिहास में बहुत कम हुआ है,वह सत्ता के शिखर तक पहुंचे,प्रधानमंत्री बने और इतना ही नही लगातार राज्य-वार भी भाजपा को "अजय" साबित कर दिया । जिसमे "उत्तर प्रदेश", "हरियाणा" से लेकर राजस्थान,मध्य प्रदेश और देश के तकरीबन 19 राज्यों में सत्ता हासिल कराई और इसमें कोई दो राय नहीं है की हर जगह की जीत का श्रेय नरेंद्र मोदी "ब्रांड" ही को गया,और इसके सामने यानि "विपक्ष" में कौन था ? भाजपा की भाषा में कहे तो "पप्पू" राहुल गांधी बस लेकिन.. वक़्त बदलता है। अब ध्यान दीजिए मौजूदा स्थिति पर आज इस घटनाक्रम को यानी मोदी "ब्रांड" को 5 साल के लगभग समय हो गया है और आश्चर्यजनक बात यह है की ठीक पांच साल बाद ही राहुल गांधी को भाजपा के गठबंधन में मौजूद पार्टी शिवसेना कह रह...

क्या हमें फर्क पड़ना बन्द हो गया है.?

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समाज का निर्माण हम करते है,हमसे होता है,तो बड़ा सवाल यह है कि हम कैसा समाज बना रहे है? किस तरह बना रहे है? जहां मृत लोग पड़े है और हम इसमे "हिन्दू मुस्लिम" ढूंढ रहे है उसमें "भाजपा कांग्रेस ढूंढ रहे है क्यों? क्यों? क्यों? क्या यह बेरहम समाज का दौर है...? "पीपली लाइव" फ़िल्म के लगभग आखिर में एक सीन है जहाँ नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और महिला जर्नलिस्ट के बीच कुछ बताचीत हो रही है जहां नवाज़ुद्दीन उस किसान के मरने की बात कर रहें है जो रोज़ 15 से 12 रुपये कमाता था और एक दिन ज़्यादा मेहनत पड़ने की वजह से मर गया,वही दूसरी तरफ वो महिला जर्नलिस्ट ये बता रही है कि "पब्लिक नत्था में ज़्यादा इंटरस्टेड है" असल मे ये फ़िल्म बनी ही इस दृश्य के लिए है। जहाँ जिस सोसायटी में हम रह रहे है,वो सोसायटी हमे इसी तरह "मैनुफेक्चर" कर रही है,इसके लिए आप "मीडिया" को दोष दीजिये "माहौल" को दीजिये या खुद को मगर हम ऐसे हो चुके है कि तीन बच्चे भूख से मर जाये या कोई आदमी अपनी मरी हुई बीवी को अपने कंधे पर हॉस्पिटल से घर ले जाये हमें सिर्फ तब तक फर्क पड़ता है जब तक कि ...

सर सैयद डे की अहमियत...

आइए आज थोड़ा इतिहास का ज़िक्र करते है,जब ब्रिटिश हुकूमत उरूज पर थी,उनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नही हिलता था,पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक सिर्फ उनका और उनक...

#Metoo महज़ सवाल नही है यह आईना है...

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पत्रकारिता जगत,सिनेमा जगत से लेकर सियासत के गलियारों तक #metoo लिखकर सवाल उठने लगें है,आरोप लगाए जा रहे है सवाल यह है कि क्या यही हमारे समाज की हकीकत है? क्या यही हमारे समाज का "निर्माण" है? यह हो क्या रहा है? बहुत बारीक बात है समझने की यह हो क्या रहा है? क्यों हो रहा है? आखिर क्यों इतनी महिलाएं एकसाथ आवाज़ बुलंद कर रही है,क्या ज़रूरत है? बात सिर्फ इतनी सी है कि यह महज एक हैशटैग नही है यह "ज़ख्म" है,जिस तरह ज़ख्म कभी भी हरा हो सकता है,उस तरह यह बात भी हो रही है। यह भी हो सकता है की कुछ लोग इसे "सनसनीखेज" बना रहे है,इसे "पब्लिसिटी" की तरह इस्तेमाल कर रहे है,लेकिन बहुत बड़ा सवाल,और कलंक या यूं कह ले हमारे समाज के लिए बीमारी यह है कि अगर इन हज़ारों आवाज़ों में से,हज़ारों सवालों में से और इन "आरोपों" में से एक भी महज़ एक भी बात सही है तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? समाज की बेहतरी की बात हो या उसके निर्माण की बात हो तो तब यह सवाल ज़रूर उठता है कि इसके लिए "कानून" बहुत ज़रुरी है,लेकिन क्या हमारे पास उचित कानून है? चलिये एक वक्त को इस मुहिम को...

ओवैसी भारतीय राजनीति के " बैरिस्टर"

असदुद्दीन ओवैसी कोंन है? हीरो है ? विलेन है? नेता है? या "मसीहा" ? सवाल बहुत बड़ा है की आख़िर एक "मुस्लिम" नाम वाला नेता,राजनीतिक,आर्थिक, सामाजिक और विदेश मुद्दों पर मुखरता से बोलता है,बात करता है और "तथ्यात्मक" बाते करता है,जो भारतीय राजनीति में बहुत कम होता है। असदुद्दीन ओवैसी भारतीय राजनीति का वो चेहरा है जो "मुस्लिमों" के मुद्दे पर "इफ्तार पार्टी","मुशायरे" से हट कर "सच्चर कमिटी" की बात रखते है,वो "मुस्लिम आरक्षण" की बात करते है,और यही वजह है कि आज उन्हें "मुस्लिम नेता" जैसी उपाधि दी जा रही है,लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि सिर्फ "मुस्लिम नेता" क्यों? "नेता" क्यों नही? आज 70 सालों के राजनीतिक इतिहास में मुस्लिमों के नेता के तौर पर जो नेता उभरे है उनमे से अधिकतर वो थे जिन्होंने सेक्युलरिज़्म की बात की है,उसका ज़िक्र किया है और इसी बात पर सत्ता हासिल भी की है,लेकिन यह राजनीतिक दल तब सवालों के घेरे में आते है जब "साम्प्रदायिक दंगे" और "नरसंहार" समाज की ...