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सर सैयद डे की अहमियत...

आइए आज थोड़ा इतिहास का ज़िक्र करते है,जब ब्रिटिश हुकूमत उरूज पर थी,उनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नही हिलता था,पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक सिर्फ उनका और उनक...

#Metoo महज़ सवाल नही है यह आईना है...

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पत्रकारिता जगत,सिनेमा जगत से लेकर सियासत के गलियारों तक #metoo लिखकर सवाल उठने लगें है,आरोप लगाए जा रहे है सवाल यह है कि क्या यही हमारे समाज की हकीकत है? क्या यही हमारे समाज का "निर्माण" है? यह हो क्या रहा है? बहुत बारीक बात है समझने की यह हो क्या रहा है? क्यों हो रहा है? आखिर क्यों इतनी महिलाएं एकसाथ आवाज़ बुलंद कर रही है,क्या ज़रूरत है? बात सिर्फ इतनी सी है कि यह महज एक हैशटैग नही है यह "ज़ख्म" है,जिस तरह ज़ख्म कभी भी हरा हो सकता है,उस तरह यह बात भी हो रही है। यह भी हो सकता है की कुछ लोग इसे "सनसनीखेज" बना रहे है,इसे "पब्लिसिटी" की तरह इस्तेमाल कर रहे है,लेकिन बहुत बड़ा सवाल,और कलंक या यूं कह ले हमारे समाज के लिए बीमारी यह है कि अगर इन हज़ारों आवाज़ों में से,हज़ारों सवालों में से और इन "आरोपों" में से एक भी महज़ एक भी बात सही है तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? समाज की बेहतरी की बात हो या उसके निर्माण की बात हो तो तब यह सवाल ज़रूर उठता है कि इसके लिए "कानून" बहुत ज़रुरी है,लेकिन क्या हमारे पास उचित कानून है? चलिये एक वक्त को इस मुहिम को...

ओवैसी भारतीय राजनीति के " बैरिस्टर"

असदुद्दीन ओवैसी कोंन है? हीरो है ? विलेन है? नेता है? या "मसीहा" ? सवाल बहुत बड़ा है की आख़िर एक "मुस्लिम" नाम वाला नेता,राजनीतिक,आर्थिक, सामाजिक और विदेश मुद्दों पर मुखरता से बोलता है,बात करता है और "तथ्यात्मक" बाते करता है,जो भारतीय राजनीति में बहुत कम होता है। असदुद्दीन ओवैसी भारतीय राजनीति का वो चेहरा है जो "मुस्लिमों" के मुद्दे पर "इफ्तार पार्टी","मुशायरे" से हट कर "सच्चर कमिटी" की बात रखते है,वो "मुस्लिम आरक्षण" की बात करते है,और यही वजह है कि आज उन्हें "मुस्लिम नेता" जैसी उपाधि दी जा रही है,लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि सिर्फ "मुस्लिम नेता" क्यों? "नेता" क्यों नही? आज 70 सालों के राजनीतिक इतिहास में मुस्लिमों के नेता के तौर पर जो नेता उभरे है उनमे से अधिकतर वो थे जिन्होंने सेक्युलरिज़्म की बात की है,उसका ज़िक्र किया है और इसी बात पर सत्ता हासिल भी की है,लेकिन यह राजनीतिक दल तब सवालों के घेरे में आते है जब "साम्प्रदायिक दंगे" और "नरसंहार" समाज की ...

कांशीराम मुलायम से मायावती अखिलेश तक ....

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बाबरी मस्जिद राम मंदिर विवाद के दौर की बात है,बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी थी,चारों तरफ हाहाकार सा मचा हुआ था,राजनितिक स्थिति भी बेहतर नही थी,और बाबरी  मस्जिद ढहाए जाने के बाद बर्खास्त हो चुकी सरकार को दोबारा चुने जाने के लिए चुनाव होना था | भाजपा पूरी तेयारी में थी क्यूंकि उसके पास "राम मंदिर" का मुद्दा था और उसे लेकर वो आश्वस्त थी,ये उस वक़्त की वो पहेली थी जो उस वक़्त में किसी से भी हल नही हो पा रही थी क्यूंकि भाजपा की उग्र राजनीति अपने चरम पर थी और बाबरी मस्जिद के ढह जाने के बाद हालात अलग थे,उस वक़्त कांग्रेस से लेकर तमाम दल चुप थे | लेकिन एक "गठबंधन" ने जेसे भाजपा को चारों खाने चित कर दिया,ये गठबंधन था मुलायम सिंह यादव और काशीराम के बीच यानी सपा और बसपा के बीच,और कुल मिलाकर कहें तो पिछड़े,अति पिछड़े और अल्पसंख्क वोट एक जुट हो गये थे,और उसी का मामला ये बना की एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद भाजपा चुनाव में बहुमत लाने में असमर्थ रही,और बसपा की मदद से मुलायम सिंह यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में बनी,उस वक़्त एक विवादित नारा भी दिया गया जी था "मिले मुलायम कांशीराम हवा मे...

विरोध,फिल्म और बॉलीवुड

भारत बड़ा देश है अलग अलग लोग,अलग रीती रिवाज़ और अलग अलग मर्जियां और अलग अलग इतिहास आब इसी अलग अलग में सब अलग है इतिहास भी कब किसी ने किसी ने किसी को कहा हराया हो या कहा कोंन हारा हो ये सब बड़ा मिला जुला सा रहता है, अब ये देश जो है "भावनाओं" का देश है, यानी भारत में कब किसकी कहा और क्यों भावनाए आहत हो जाएँ,मालूम ही नही चलता,किसी बात से ,किसी किताब से और कब किस "बयान" से भावना आहत हो जाएँ मालूम नही चलता और अब तो बात फिल्मों तक आ गयी है | फिल्मे हमे जोडती है,हमे उनमे सब कुछ अपना सा लगता है ,ये हमे अलग अलग पहलुओं से रूबरू कराती है और यही बात है की उनकी अहमियत भी बहुत है लेकिन ये अहमियत जब शक के घेरें में आ जाती है जब ये "विवाद" में पड़ जाती है,नया नया विवाद है फिल्म "पद्मावत" का जिसका नाम पहले पद्मावती था जिसे तब्दील कर "पद्मावत" किया गया है,लेकिन विरोध है की शांत ही नही हो रहा है,एक तरफ करनी सेना है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का बयान है | गौरतलब है की मशहूर फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने ये फिल्म बनाई थी,लेकिन पिछले वर्ष दिसम्बर में रिलीज़ ह...

मंटो जो समाज को आईना दिखाता है ...

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मंटो जिसने "विभाजन" देखा,जिसने "इन्सान" को "इन्सान" के हाथो मरते देखा जिसने दो "कोमों" को बंटते हुए देखा और जिसने देखा की केसे "खून" की प्यास इन्सान ही को हो जाती है , ये सब मंटो ने देखा महसूस किया और उसने एक समाज,एक देश,एक कौम को "मजहब" के नाम दो टुकड़े टुकड़े होते देखा और देखा की केसे नफरतें बढ़ते बढ़ते इन्सान ही इन्सान के दुश्मन हो जातें है | ये सब मंटों ने देखा और अपनी बड़ी मगर कम उम्र में देखते देखते आज ही के दिन इस दुनिया को छोड़ कर चले गये | आज ज़िक्र हो रहा है "बदनाम" सआदत हसन मंटो की आज ही  के दिन वो दुनिया को छोड़ क्र चलें गयें थे | सआदत हसन मंटों की पैदाइश ब्रिटिश पंजाब में समराला में हुआ था,11 मई 1912 को पैदाइश पाने वाले मंटो ने बटोर रायटर नोवल,शोर्ट स्टोरीज़ और कई नाटक भी लिखे और मंटों का लिखा इस तरह इन्सान को इस तरह असर डालता था इस कदर की लोगों के दिलों दिमाग पर वो असर करता था और भी इससे उन पर "अश्लील" होने के मुकदमे तक चले |  अपनी जिंदगी को बिताया नही जिया और उसमे उन्होंने बहुत तकलीफें झेली क...

किताबें.

किताबे,पुस्तक और बुक्स इन तीनो ही शब्दों के मायने एक है लेकिन एक है "किताब" जो क़ुरान है,जो गीता है और गुरु ग्रन्थ साहिब है और दूसरी है "पुस्तक" जो किसी भी हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार और पाठक के मुंह से हम सुन सकतें है और तीसरी है "बुक" यानी "दी बुक ऑफ़ एलाई" बाइबिल | आपको लग रहा है ये तो सभी को पता है इसमें बताने वाली क्या बात है ? लेकिन है आप देखिये गिने,तोले और नपे शब्दों के मानिंद बनी और एक जगह कुछ पन्नो में किसी कवर के बीच मौजूद ये किताबे कितनी है जो हर धर्म,विचार और हिसं से लेकर अलग अलग जगहों पर मौजूद है और हमेशा रही है क्यूंकि किताबें ऐसी चीज़ है जो इन्सान को जिंदा रखती है | किताबें इन्सान को जिंदा रखती है इसका मतलब ये नही है उसमे एनर्जी है उनमे प्रोटीन है लेकिन ये किताबें ही है जो "इन्सान" को सलीका देती है ,वरना ऐसी क्या वजह है आज से 1400 साल पहले लिखी गयी एक किताब "क़ुरान" आज भी करोड़ों लोगों को ये बता रही है "तुम सभी इंसान एक ही माँ बाप की औलाद हो और तुममे कोई ऊंच नीच नही है" है न अद्भुत | यह किताब ही तो है ...