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कांशीराम मुलायम से मायावती अखिलेश तक ....

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बाबरी मस्जिद राम मंदिर विवाद के दौर की बात है,बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी थी,चारों तरफ हाहाकार सा मचा हुआ था,राजनितिक स्थिति भी बेहतर नही थी,और बाबरी  मस्जिद ढहाए जाने के बाद बर्खास्त हो चुकी सरकार को दोबारा चुने जाने के लिए चुनाव होना था | भाजपा पूरी तेयारी में थी क्यूंकि उसके पास "राम मंदिर" का मुद्दा था और उसे लेकर वो आश्वस्त थी,ये उस वक़्त की वो पहेली थी जो उस वक़्त में किसी से भी हल नही हो पा रही थी क्यूंकि भाजपा की उग्र राजनीति अपने चरम पर थी और बाबरी मस्जिद के ढह जाने के बाद हालात अलग थे,उस वक़्त कांग्रेस से लेकर तमाम दल चुप थे | लेकिन एक "गठबंधन" ने जेसे भाजपा को चारों खाने चित कर दिया,ये गठबंधन था मुलायम सिंह यादव और काशीराम के बीच यानी सपा और बसपा के बीच,और कुल मिलाकर कहें तो पिछड़े,अति पिछड़े और अल्पसंख्क वोट एक जुट हो गये थे,और उसी का मामला ये बना की एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद भाजपा चुनाव में बहुमत लाने में असमर्थ रही,और बसपा की मदद से मुलायम सिंह यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में बनी,उस वक़्त एक विवादित नारा भी दिया गया जी था "मिले मुलायम कांशीराम हवा मे...

विरोध,फिल्म और बॉलीवुड

भारत बड़ा देश है अलग अलग लोग,अलग रीती रिवाज़ और अलग अलग मर्जियां और अलग अलग इतिहास आब इसी अलग अलग में सब अलग है इतिहास भी कब किसी ने किसी ने किसी को कहा हराया हो या कहा कोंन हारा हो ये सब बड़ा मिला जुला सा रहता है, अब ये देश जो है "भावनाओं" का देश है, यानी भारत में कब किसकी कहा और क्यों भावनाए आहत हो जाएँ,मालूम ही नही चलता,किसी बात से ,किसी किताब से और कब किस "बयान" से भावना आहत हो जाएँ मालूम नही चलता और अब तो बात फिल्मों तक आ गयी है | फिल्मे हमे जोडती है,हमे उनमे सब कुछ अपना सा लगता है ,ये हमे अलग अलग पहलुओं से रूबरू कराती है और यही बात है की उनकी अहमियत भी बहुत है लेकिन ये अहमियत जब शक के घेरें में आ जाती है जब ये "विवाद" में पड़ जाती है,नया नया विवाद है फिल्म "पद्मावत" का जिसका नाम पहले पद्मावती था जिसे तब्दील कर "पद्मावत" किया गया है,लेकिन विरोध है की शांत ही नही हो रहा है,एक तरफ करनी सेना है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का बयान है | गौरतलब है की मशहूर फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने ये फिल्म बनाई थी,लेकिन पिछले वर्ष दिसम्बर में रिलीज़ ह...

मंटो जो समाज को आईना दिखाता है ...

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मंटो जिसने "विभाजन" देखा,जिसने "इन्सान" को "इन्सान" के हाथो मरते देखा जिसने दो "कोमों" को बंटते हुए देखा और जिसने देखा की केसे "खून" की प्यास इन्सान ही को हो जाती है , ये सब मंटो ने देखा महसूस किया और उसने एक समाज,एक देश,एक कौम को "मजहब" के नाम दो टुकड़े टुकड़े होते देखा और देखा की केसे नफरतें बढ़ते बढ़ते इन्सान ही इन्सान के दुश्मन हो जातें है | ये सब मंटों ने देखा और अपनी बड़ी मगर कम उम्र में देखते देखते आज ही के दिन इस दुनिया को छोड़ कर चले गये | आज ज़िक्र हो रहा है "बदनाम" सआदत हसन मंटो की आज ही  के दिन वो दुनिया को छोड़ क्र चलें गयें थे | सआदत हसन मंटों की पैदाइश ब्रिटिश पंजाब में समराला में हुआ था,11 मई 1912 को पैदाइश पाने वाले मंटो ने बटोर रायटर नोवल,शोर्ट स्टोरीज़ और कई नाटक भी लिखे और मंटों का लिखा इस तरह इन्सान को इस तरह असर डालता था इस कदर की लोगों के दिलों दिमाग पर वो असर करता था और भी इससे उन पर "अश्लील" होने के मुकदमे तक चले |  अपनी जिंदगी को बिताया नही जिया और उसमे उन्होंने बहुत तकलीफें झेली क...

किताबें.

किताबे,पुस्तक और बुक्स इन तीनो ही शब्दों के मायने एक है लेकिन एक है "किताब" जो क़ुरान है,जो गीता है और गुरु ग्रन्थ साहिब है और दूसरी है "पुस्तक" जो किसी भी हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार और पाठक के मुंह से हम सुन सकतें है और तीसरी है "बुक" यानी "दी बुक ऑफ़ एलाई" बाइबिल | आपको लग रहा है ये तो सभी को पता है इसमें बताने वाली क्या बात है ? लेकिन है आप देखिये गिने,तोले और नपे शब्दों के मानिंद बनी और एक जगह कुछ पन्नो में किसी कवर के बीच मौजूद ये किताबे कितनी है जो हर धर्म,विचार और हिसं से लेकर अलग अलग जगहों पर मौजूद है और हमेशा रही है क्यूंकि किताबें ऐसी चीज़ है जो इन्सान को जिंदा रखती है | किताबें इन्सान को जिंदा रखती है इसका मतलब ये नही है उसमे एनर्जी है उनमे प्रोटीन है लेकिन ये किताबें ही है जो "इन्सान" को सलीका देती है ,वरना ऐसी क्या वजह है आज से 1400 साल पहले लिखी गयी एक किताब "क़ुरान" आज भी करोड़ों लोगों को ये बता रही है "तुम सभी इंसान एक ही माँ बाप की औलाद हो और तुममे कोई ऊंच नीच नही है" है न अद्भुत | यह किताब ही तो है ...

दीदी का जादू केसे छाया...

ममता बनर्जी एक करिश्माई नेता है और इस बात को होने में या करने में वक़्त लगता है इस वक़्त में स्ब्बसे ईमानदारी से और संघर्षशील होकर ज़मीनी स्तर पर काम करने की शुरुआत ममता बनर्जी ने की और उसी के बाद फर्श से अर्श तक का सफर किया है | इसे करने में ममता ने जो काम किया उसने ही उन्हें एक परिपक्व नेता बनाया आज उनके जन्मदिन पर उनकी इन चीजों को याद किया जाना ज़रूरी है |  यही बात तब अहम हो जाती है जब आप ज़मीनी संघर्ष कर रहें है | ममता को कुछ भी थाली में सजा नही मिला उन्होंने हासिल किया | ममता बनर्जी जो अपने उग्र और तेज़ तर्रार रवय्ये की वजह से बदनाम थी उसे उन्होंने कभी बदला नही और यही वजह रही की सरकारें और हालत बदलें मगर ममता नही,ममता बनर्जी ने 1998 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और अच्छी शुरुआत के बाद ये दल कमज़ोर आने लगा और भाजपा के साथ और कभी कांग्रेस के साथ जा जाकर ममता कमज़ोर होती नजर आई और कई राजनितिक आंकलन करने वालों ने उनके खत्म होने की बात तक कह दी | लेकिन ममता ने मौका ढूँढा और वो उन्हें मिला भी गया | 30 साल सत्ता में गुज़ार चुकी सीपीआई ने अपनी नीतियों से हट कर ओद्योगिक घर...

"आप" ऐसे तो न थे ...

"आप" ऐसे तो न थे ... आम आदमी पार्टी ने बड़े असमंजस पर लगाम लगाकर अपने राज्यसभा के उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है . आम आदमी पार्टी के अलावा कोई भी पार्टी होती तो सोच लेते की कोई बात नही जो किया तो किया तो किया मगर "आप" से सवाल किया जाना अहम है | आप से बात करना ज़रूरी है क्यूंकि जो बात पार्टी सिद्धांत और आंदोलनों से होकर गुजरी हो और ऐसे वेसे ही किसी अनजान चेहरे को राज्यसभा भेज देगी और भेज देगी और जिन्हें नज़रंदाज़ करके ये किया गया तो ये तो हिला देने जेसा ही है | आप ने तीन नामों की घोषणा की है पहले है आप के दिग्गज नेता संजय सिंह जिनका नाम दिया जाना आखिर उन्होंने मेहनत बहुत की है लेकिन सवाल बाकी दो नामों पर है जिसमे एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता  की उम्मीदवारी तय कर दी है | इस ऐलान के साथ ही सवाल ये है की आखिर अंजान चेहरे को क्यों राज्यसभा भेजा गया? क्यों राज्यसभा जेसी अहम जगह पर पूर्व वरिष्ट पत्रकार आशुतोष,वरिष्ट नेता कुमार विश्वास को अनदेखा किया है | अब "आम आदमी पार्टी" से सवाल ये है की क्यूँ? वो ये बताएं की इतना बड़ा कदम केसे ? केसे वरिष्ट नेताओं को ...

राहुल गाँधी के नाम खत..

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आदरणीय राहुल गांधी जी,अध्यक्ष राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी सुपुत्र स्वर्गीय राजीव गांधी, प्रपौत्र इंदिरा गांधी सबसे पहले आपको कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की शुभकामनाएं, राहुल गांधी जी भारतीय राजनीति में आपका और आपकी पार्टी का हमेशा दबदबा रहा है लेकिन अब आप अपने सवा सौ साल के इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहें है,ये आपके लिए चिंता का विषय है लेकिन क्यों ये आपको पता है? राहुल गांधी जी एक परिंदा अगर उड़ना छोड़ दें और और शेर अगर शिकार करना छोड़ दें तो वो क्या करता है? आपको पता है? मुझे तो नही पता क्योंकि उसका खुद का भी पता नही रहता है वो कहा गयाऔर ये सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अपनी "महत्वता" खो चुका है,भूल चुका है।क्या यही स्थिति आपके साथ नही है? क्या आप देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय राजनीतिक दल नही है क्या आप "विपक्षी" दल नही है? तो आप ऐसा महसूस क्यों नही करा रहें है? सवाल बहुत प्रैक्टिकल है कि क्यों आप और आपकी पार्टी अपनी मूल विचारधारा से परे होकर "क्लोन" बनना चाह रही है? क्यों आप "सॉफ्ट हिंदुत्व" को महत्वता दे रहें है ? क्यों आप खुद को "ब...