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ज़िम्मेदारी और हालात ...

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मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया एक 'हीरो' की तरह,और उसके पीछे उन्होंने वजह बताई दलितों पर होने वाले अत्याचार पर न बोले जाने देना,अब इस प्रकरण के तमाम राजनितिक,सामाजिक और वैचारिक मतभेद बुराई और अच्छाई को हटा कर सोचिये की इस्तीफा देना कितनी बड़ी बात है और सिर्फ बात मायावती की नही है बात है विरोध दर्ज करा देने की,और अपने समाज के साथ खड़े हो जाने की उनके दुःख को अपना समझ पाने की,लेकिन आप इसी स्थिति को थोड़ा सा पलट दीजिये तो आपको एक ऐसा समाज नजर आएगा जो न इस्तीफा देना जानता है,न विरोध दर्ज कराना जानता है | कुछ ध्यान आया? ये समाज मुस्लिम समाज है जो "राजनीति' के तहत ही सही दे तो मगर 'इस्तीफा' देना जानता ही नही है,विरोध दर्ज कराना जानता ही नही है ,जिसके लिए और जिसके "नेताओ" के लिए इन चीजों के मायने है ही नही | आज से तकरीबन चार साल पहले मुज़फ्फरनगर में आग लगी थी,दंगों की आग पूरा ज़िला दंगे की चपेट में था,हजारों की तादाद में मुस्लिम समाज के लोग बेघर हो गये थे,सेकड़ों मारे गये थे,हालात ये हो गयें थे की सडक पर सेना को उतरना पड़ा था,चलिए जी किसी तरह हालत स्थि...

"विपक्ष" कहाँ है ?

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देश की राजनीति अब नये मूड में है,यानि कमजोर विपक्ष के सामने पूर्ण बहुमत की सरकार,लेकिन गौर करने की बाद ये है की "विपक्ष" किस स्थिति में है? किस जगह खड़ा है ? और केसे आगे बढ़ेगा? ये सवाल राजनीतिक गलियारों में अचानक से कूद गया है,क्यूंकि अब स्थिति आ गयी है एक नये एक्शन की,यानी "भाजपा" के बढ़ते जनाधार के खिलाफ किसे और केसे कोंन खड़ा हो सकता है? क्यूंकि ये बात तो सिद्ध हो गयी है की अब भाजपा के "मोदी" के सामने कोई चेहरा है नही,तो 2019 में क्या होगा ? कांग्रेस-अगर सबसे पहले बात कांग्रेस की करें तो वो इस वक़्त ज़मीन पर है,उसके पास कोई नेता नही है,और उसके "युवराज" कमज़ोर होते हुए नजर आ रहें है और जेस जेसे राहुल बढ़ रहें है कांग्रेस मजबूत की जगह और बहुत और कमज़ोर हो रही है,उसके पास न तो नेतृत्व है और न ही कोई नेता इसलिए कांग्रेस सिर्फ राष्ट्रीय दल जेसा दिख सकती है | सपा- पांच साल सत्ता में शीर्ष पर रही समाजवादी पार्टी इस वक़्त अच्छी स्थिति में नही है दो धड़ों में बंटने को तैयार है,हाल तो ये है की सेकुलर होने का नाम डदम भरने वाली सपा इस बार भाजपा के प्रत्याशी को...

"ये केसा सेकुलरिज्म है साहब"

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राष्ट्रपति चुनाव में "सेकुलर" मसीहाओं से लेकर भाजपा के बड़े विरोधी भाजपा के उम्मीदवार कोविन्द जी को वोट देते हुए नजर आये तो सवाल यूँ ही ये उठा गया क्या कोई "विचारधारा" अहम है ही नही? राजनीति के ऐतबार से कुछ चीज़ें ऐसी है जिन पर गौर करना चाहिए और इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है "विचारधारा",यानी दक्षिणपंथी,वामपंथी,सामप्रदायिक और सेकुलर वगेराह वगेराह,लेकिन राजनीति का एक उसूल है की कामयाब वही होता है जो अपनी विचारधारा पर टिका रहता है|  इसमें सबसे उपर और इमानदारी से अव्वल पर आती है,"भाजपा" जो चाहें दो सांसदों के साथ रही हो या दो सो के साथ या सत्ता में रही हो या विपक्ष में उका एजेंडा तय है "हिंदुत्व" जिस पर वो टिकी है,लेकिन एक और सवाल ये है की भाजपा के विरुद्ध खड़े तमाम और दलों की विचारधारा क्या है? सबसे पहले कांग्रेस है बड़ी पार्टी है और पुरानी पार्टी है और भाजपा की धुर विरोधी है लेकिन उसकी विचारधारा ऐसी है की उसके नेता 'राम मंदिर' का ताला खुलवाने का आदेश देते है,कहते है की हम "राम राज" लायेंगे और उसी के राज में '...

"बहन जी रिटर्न्स"

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आज एक तस्वीर राज्यसभा ने नज़र आई,ये तस्वीर थी तो आज ही कि मगर बिल्कुल पच्चीस से तीस साल पुरानी लग रही थी,क्योंकि यहां "बहन जी" उसी अंदाज में बोल रही थी जिसमे वो बोला करती थीं, जिसमे "अपने समाज" के लिए सवाल किया करती थी और अपने समाज के साथ खड़ी रहा करती थी। मायावती जी आज सदन में बोली और ऐसा बोली कि सदन के एक एक मेम्बर ने उन्हें देखा,अब इस घटनाक्रम के सही और गलत को छोड़ कर अगर नज़र घुमाएं तो असलियत सामने यूँ आती है कि आज जो सदन में बोल रही थी वो मायावती वो थी जो आज से तीस या पच्चीस साल पहले बोला करती थी,यानी दहाड़ा करती "बामसेफ" के लिए, हर एक उत्तेजक नारा लगाया करती थी और बेझिझक, बेबाक़ और निडर होकर "अपने समाज" के लिए बोला करती थी,आज सदन में नज़र आने वाली तस्वीर ऐसे ही नही थी ये तस्वीर,बहुत बड़ी थी क्योंकि ये 'बहन जी' को वापस लायी है । इस तस्वीर ने एक नई हलचल पैदा कर दी है और कई बातें सामने रख दी है कि क्या बहन जी फिर से ज़मीन पर उतरेंगी? क्या फिर से "डीएस फ़ॉर" को साथ जोड़ने की क़वायद तेज़ करेंगी? क्या फिर से "दलित पुत्री" ...

विलुप्त होता "सद्भाव"

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आप हाल फिलहाल में आने वाली खबरों पर ज़रा गौर करें,यानी उसका पैटर्न देखें कि वो क्या है,यानी उदाहरण के तौर पर "हिन्दू शरणार्थियों को मुस्लिम युवकों ने बचाया","मुस्लिमों की मदद को आगे आएं हिन्दू" या वगैराह वगैराह ऐसी न जाने कितनी ही खबरों को सोशल मीडिया से लेकर से आम बातों में भी लाया जाता है,और बहुत गौर फिक्र करते हुए लाया जाता है,लेकिन ऐसा क्यों है? क्या वजह है कि एक वक्त में आम खबरें आज ज़ख्मों पर मलहम जैसा काम कर रही है? पता है ऐसा क्यों क्योंकि हालात ऐसे हो गए है,हालात ये हो गये है हर एक तबका दूसरे के खून का प्यासा हुआ जा रहा है,ऐसा प्यासा की किसी बेगुनाह की मौत "विकेट गिरना" नज़र आने लगी है,क्या ये हालात बेहतर है ? क्या ये स्थित अच्छी है ? क्या ये भारत के मिजाज़ के लिये अच्छा है? सवाल बहुत पेचीदा है कि क्यों ये स्थिति ही ये आ गयी है ?अब हो सकता है कि एक तबका इस मसले को "आरएसएस" से जोड़ दें,दुसरा तबका इस मसले को "बढ़ती आबादी" से जोड़ दें,लेकिन असल मायनों में दिक्कत ये तबके ही है,जो राजनीति,लोकतंत्र, वोट और अधिकारों का ढोल सिर्फ और...

आप चुप क्यों है ?

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सामाजिक योद्धा,साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ने वाले और सबसे पुराने "समाजवादी" और चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहें और देश के रक्षा मंत्री आदरणीय मुलायम सिंह यादव जी आखिर चुप क्यों है? क्या वजह है ? क्या बात है ऐसी जो वो चुप है? क्यों कुछ नही बोल रहें है देश की यथास्थिति पर? और बोलें तो क्या उससे भी ज्यादा बढ़ चढ़ कर भाजपा और एनडीऐ के राष्ट्रपति उम्मीदवार की घोषणा होते ही फौरन ही उनके समर्थन का ऐलान कर दिया,अरे क्यों साहब क्या वजह है क्या वजह है बकौल आपके "सांप्रदायिक शक्ति" को आप समर्थन कर रहें है? वो भी मीरा कुमार जेसे बड़े नाम के होते हुए भी ? जवाब कही से मिल नही रहा है और तो और लगभग दो धडों में बंटी सपा का अखिलेश धड़ा भी रामनाथ कोविंद को समर्थन का ऐलान कर गया और चुप सा हो गया,ये सब हो क्या रहा है ?आखिर क्यों ऐसा हो रहा है की सम्प्रद्यिक ताकतों से लड़ने वाले "नेता जी: और उनके सुपुत्र तक भी आज भाजपा के राष्ट्रपति उम्मीदवार के साथ खड़े है? कोई माकूल जवाब तो है नही बस बात ये है की कोई शायद दुखती रग है जिसे दबने देना नही दिया जा सकता है और इसीलिए शायद इतने हंगामे...

धर्म का मामला है

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धर्म इस देश का सबसे सेंसिटिव मसला है और जब धर्म सेंसिटिव है तो इससे जुडी हर एक चीज़ सेंसिटिव है यानी इसके मानने वाले और इसेक मसले मसाइल और इसके "मुखिया" भी, मुखिया से मुराद वो लोग है जो इसके बड़े होने का दावा करते है और सबसे ज्यादा दिक्कत इन्ही से शुरू होती है क्यूंकि मीडिया के सामने झट से बोलने वाले और कुछ भी बोलने वाले यही लोग होते है बोल कर चले जाते है और न्य बखेड़ा कर देते है या इनका किया काम "धर्म" की पहचान बन जाता है,ऐसे ही कई मुख्य लोगों पर गौर करते है. इस फेहरिस्त में पहले है स्वामी ॐ जी जो "हिन्दू" धर्म का चोगा ओढ़े रखते है और भरे टीवी पर खुलेआम महिला के साथ मारपीट कर चुके है और रियलिटी शो बिग बॉस में जाकर तमाम तरह की बातें जोड़ कर शोर और हंगामा कर चुके है और ताज़ा ताज़ा चीज़ है एक नग्न महिला के साथ उनकी तस्वीर आ जाना लेकिन क्या ये हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करते है? दसूरे है मोलाना बरकती जी हां पूर्व में टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम जो इमाम नही थे बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रवक्ता की तरह बातें किया करते थे,और ऊल जलुल बयानात देते रहत...