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अटल जी क्या आप "अटल" थे?

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अटल जी, आप राजनीती के "अटल" है,कहते है आप बेहतरीन वक़्ता हुआ करते थे,आपने देश के "कारगिल" विजय कराया,आपने बिना "कांग्रेस" वाली सरकार पांच साल चलाकर दिखाई,बहुत बड़ी हिम्मत चाहिए होत...

तमाम दुनिया के लिए रहमत

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राबिउल्लअव्वल के महीने का 12रवां दिन का गवाह है एक ऐसी शख़्सियत की पैदाइश का जो तमाम इंसान के लिए रहमत बन कर आये,जिस शख़्सियत ने अपने हुस्न ए अख़लाक़ की वजह से अपने विरोध करने वाले ...

विपक्ष,लोकतंत्र और सरकार...

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"सरकारें आएँगी जाएँगी, पार्टियां बनेगी बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए इस देश का लोकतंत्र रहना चाहये" ये पंक्तियां पूर्व प्रधामंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी सरकार गिर...

ताक़ि सड़क शांत न हो...

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धरना,भूख हड़ताल अनशन या किसी और मांग को लेकर प्रोटेस्ट करना,आंदोलन करना इन सारी गतिविधियों को देख कर या ज़्यादा व्यस्त लोगों को ये सब सुनकर केसा लगता है? सोचिये थोड़ा ज़ोर डालिय...

ताक़ि सड़क शांत न हो...

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धरना,भूख हड़ताल अनशन या किसी और मांग को लेकर प्रोटेस्ट करना,आंदोलन करना इन सारी गतिविधियों को देख कर या ज़्यादा व्यस्त लोगों को ये सब सुनकर केसा लगता है? सोचिये थोड़ा ज़ोर डालिये नही डाल पाएं कहिये न आता होगा "अरें ये तो रोज़ का है" "काम धंधा नही है" या "छोड़ों इन्हें तो कोई काम नही" यही आता है न, क्यों है न... जंतर मंतर से गुज़रियें कभी चारों तरफ देख कर सोचेंगे अरें क्या है लोग, लेकिन क्या है ये लोग का जवाब कभी मिला है आपको? उसका जवाब है कि उम्मीद है वो लोग,आशा है वो लोग लोकतंत्र का हिस्सा है वो लोग , हमारे लिए आम सी बात होती है किसी का धरना प्रदर्शन लेकिन ये धरना कितनी काबिलियत रखता है इस बात का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते है कि इसी धरने ने एक आम से वक़ील को 'महात्मा' बना दिया था ,बापू बना दिया था। आपकों शायद धरने से बापू बने बात अजीब लगी होगी लेकिन इसी धरने ने एक "आयरन लेडी" की सरकार उखाड़ फेंका था, "दुर्गा" कही जाने वाली इंदिरा की ज़मानत ज़ब्त करा दी थी ,ये वही आम सा धरना था जिसने इतिहास बदला था और लोगों को एक नई सुबह दी थी अंजाम जो...

भीड़ का न कोई जवाब न सवाल...

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भीड़ कही भी कभी भी लोगों का जमा होना, भीड़ क्या है कब है,क्यों है ये अलग अलग मायने रखती है लेकिन ये भीड़ अब की नही है पुरानी भी है,ये भीड़ हमेशा से ही बुरे और अच्छे  के साथ भी कंधे से कंधे को मिला चल चुकी है, लेकिन ये "भीड़" कभी भी कही भी आसानी से नज़र आती है , लेकिन आज की ये भीड़ जानलेवा हो गयी ये भीड़ खून की प्यासी हो गयी है. में इस भीड़ का "धर्म" नही ढूंढ रहा हूँ आप भी मत ढूँढिये, आप बस अंदर झाँक कर पूछिये की आप इसके साथ है या खिलाफ? हमेशा से एक बात तय होती है कि इस भीड़ की कोई शक़्ल नही होती,इस भीड़ का कोई आकार नही होता तभी ये भीड़ '47' से हाशिमपुरा,भागलपुर और फिर गुजरात न पहुँचती, और अगर ये सब होता तो "मुज़फ्फरनगर" पहुचने की सोचती नही लेकिन अफ़सोस ऐसा ही हुआ. लेकिन इन सब के बावजूद एक सहानुभूति होती थी हर "दंगे" के बाद एक अमन का रास्ता होता था ,हर बार इस भीड़ के तांडव बाद जब जब ये भीड़ मुज़फ्फरनगर में खून सड़कों पर फैलाती थी,जब जब ये भीड़ दिल्ली की सड़कों पर 84 में लाशें बिछाती थी, तब तब इस भीड़ के ख़िलाफ़ भारत खड़ा होता था और भीड़ को मात दी जाती थी,लेकिन क्...

गांधी...

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गाँधी जिस शख्सियत के बारे में बचपन से पढ़ा,सुना या जाना अच्छा भी बुरा भी, लेकिन एक बात हमेशा चुभती थी की क्यों देश को आज़ाद कराने वाली शख़्सियत को क्यों कोई बुरा भला कहेगा,हां दो अलग धारणाएं बन गयी थी दिल में जो गाँधी को लेकर कन्फ्यूज़ करती थी. अगर बात गाँधी जी की ज़िन्दगी की करें तो वो खुद अपनी कोताही,गलती,नाकारगी को अपनी बियोग्राफी में बयान करते है और यक़ीन मानिये ये एक बहुत बड़ी बात है बहुत हिम्मत का काम है, फिर उसके बाद हम क्यों गाँधी जी को उनके व्यक्तित्व को लेकर बुरा कहे.. अब बात गाँधी जी के विदेश जाने की जहा जाकर उन्होंने वो आंदोलन शुरू किया जो सच में अद्भुत था,मगर जब वो भारत आएं तो उन्होंने चंपारण जाकर यही काम किया, ऊंच नीच को खत्म करना चाहा, लेकिन इन सारी बातों पर गांधी जी वहां विफल हो गए जहाँ उन्हें जातिवाद का विरोध करना था वो जातिवाद के साथ खड़े नज़र आये. इसके बाद जब बंटवारा गांधी जी के हाथ के नीचे हो चूका,साम्प्रदायिक दंगे छिड़ चुके (वो अलग बात है गाँधी जी इसके ज़िम्मेदार है या नही) लेकिन फिर भी गांधी जी जलती हुई दिल्ली,दंगों की आग में जलती हुई दिल्ली को छोड़ कर (नोआखली) चले गए क्यो...