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ताक़ि सड़क शांत न हो...

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धरना,भूख हड़ताल अनशन या किसी और मांग को लेकर प्रोटेस्ट करना,आंदोलन करना इन सारी गतिविधियों को देख कर या ज़्यादा व्यस्त लोगों को ये सब सुनकर केसा लगता है? सोचिये थोड़ा ज़ोर डालिय...

ताक़ि सड़क शांत न हो...

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धरना,भूख हड़ताल अनशन या किसी और मांग को लेकर प्रोटेस्ट करना,आंदोलन करना इन सारी गतिविधियों को देख कर या ज़्यादा व्यस्त लोगों को ये सब सुनकर केसा लगता है? सोचिये थोड़ा ज़ोर डालिये नही डाल पाएं कहिये न आता होगा "अरें ये तो रोज़ का है" "काम धंधा नही है" या "छोड़ों इन्हें तो कोई काम नही" यही आता है न, क्यों है न... जंतर मंतर से गुज़रियें कभी चारों तरफ देख कर सोचेंगे अरें क्या है लोग, लेकिन क्या है ये लोग का जवाब कभी मिला है आपको? उसका जवाब है कि उम्मीद है वो लोग,आशा है वो लोग लोकतंत्र का हिस्सा है वो लोग , हमारे लिए आम सी बात होती है किसी का धरना प्रदर्शन लेकिन ये धरना कितनी काबिलियत रखता है इस बात का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते है कि इसी धरने ने एक आम से वक़ील को 'महात्मा' बना दिया था ,बापू बना दिया था। आपकों शायद धरने से बापू बने बात अजीब लगी होगी लेकिन इसी धरने ने एक "आयरन लेडी" की सरकार उखाड़ फेंका था, "दुर्गा" कही जाने वाली इंदिरा की ज़मानत ज़ब्त करा दी थी ,ये वही आम सा धरना था जिसने इतिहास बदला था और लोगों को एक नई सुबह दी थी अंजाम जो...

भीड़ का न कोई जवाब न सवाल...

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भीड़ कही भी कभी भी लोगों का जमा होना, भीड़ क्या है कब है,क्यों है ये अलग अलग मायने रखती है लेकिन ये भीड़ अब की नही है पुरानी भी है,ये भीड़ हमेशा से ही बुरे और अच्छे  के साथ भी कंधे से कंधे को मिला चल चुकी है, लेकिन ये "भीड़" कभी भी कही भी आसानी से नज़र आती है , लेकिन आज की ये भीड़ जानलेवा हो गयी ये भीड़ खून की प्यासी हो गयी है. में इस भीड़ का "धर्म" नही ढूंढ रहा हूँ आप भी मत ढूँढिये, आप बस अंदर झाँक कर पूछिये की आप इसके साथ है या खिलाफ? हमेशा से एक बात तय होती है कि इस भीड़ की कोई शक़्ल नही होती,इस भीड़ का कोई आकार नही होता तभी ये भीड़ '47' से हाशिमपुरा,भागलपुर और फिर गुजरात न पहुँचती, और अगर ये सब होता तो "मुज़फ्फरनगर" पहुचने की सोचती नही लेकिन अफ़सोस ऐसा ही हुआ. लेकिन इन सब के बावजूद एक सहानुभूति होती थी हर "दंगे" के बाद एक अमन का रास्ता होता था ,हर बार इस भीड़ के तांडव बाद जब जब ये भीड़ मुज़फ्फरनगर में खून सड़कों पर फैलाती थी,जब जब ये भीड़ दिल्ली की सड़कों पर 84 में लाशें बिछाती थी, तब तब इस भीड़ के ख़िलाफ़ भारत खड़ा होता था और भीड़ को मात दी जाती थी,लेकिन क्...

गांधी...

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गाँधी जिस शख्सियत के बारे में बचपन से पढ़ा,सुना या जाना अच्छा भी बुरा भी, लेकिन एक बात हमेशा चुभती थी की क्यों देश को आज़ाद कराने वाली शख़्सियत को क्यों कोई बुरा भला कहेगा,हां दो अलग धारणाएं बन गयी थी दिल में जो गाँधी को लेकर कन्फ्यूज़ करती थी. अगर बात गाँधी जी की ज़िन्दगी की करें तो वो खुद अपनी कोताही,गलती,नाकारगी को अपनी बियोग्राफी में बयान करते है और यक़ीन मानिये ये एक बहुत बड़ी बात है बहुत हिम्मत का काम है, फिर उसके बाद हम क्यों गाँधी जी को उनके व्यक्तित्व को लेकर बुरा कहे.. अब बात गाँधी जी के विदेश जाने की जहा जाकर उन्होंने वो आंदोलन शुरू किया जो सच में अद्भुत था,मगर जब वो भारत आएं तो उन्होंने चंपारण जाकर यही काम किया, ऊंच नीच को खत्म करना चाहा, लेकिन इन सारी बातों पर गांधी जी वहां विफल हो गए जहाँ उन्हें जातिवाद का विरोध करना था वो जातिवाद के साथ खड़े नज़र आये. इसके बाद जब बंटवारा गांधी जी के हाथ के नीचे हो चूका,साम्प्रदायिक दंगे छिड़ चुके (वो अलग बात है गाँधी जी इसके ज़िम्मेदार है या नही) लेकिन फिर भी गांधी जी जलती हुई दिल्ली,दंगों की आग में जलती हुई दिल्ली को छोड़ कर (नोआखली) चले गए क्यो...

कानून... और बदलाव..

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इंसान ईश्वर द्वारा निर्मित सबसे बेहतरीन मख़लूक़ है जिसे ईश्वर ने खून की नाज़ुक बूँद से बनाया गया,इंसान जिसे एक ही माँ बाप के ज़रिये पैदा किया गया जो सभी के सभी एक ही माँ बाप की औलाद है वो आपस में कितनी चीज़ों को बदल चुके है या कितने उलजलूल बदलाव कर चुके है इसकी कोई गिनती नही लेकिन कानून उसमें से एक है जो नज़र के सामने है जो बुराई से रोकने का माद्दा रखता है और किसी हद तक असर रखता है और भारत में कानून को स्तिथि क्या है? कानून इसके नज़रिये से बात करें तो जिस तरह पानी को बहने से रोकने के लिए जिस तरह रुकावट बनाई जाती है ठीक उसी तरह कानून भी एक अहम रुकावट पैदा करने का काम करता है, और बुराई से रोकने काम काम करता है और डर बेठाता है की नही मुझे गलत काम नही करना वरना सज़ा मिलेगी, यही वजह है को आज से 1400 से साल पहले भी इंसान को खड़ा करके काटने वाले अरबी लोगों पर जब ये "कानून" लागू किया गया तो वो बदल गए उनके अंदर का ज़मीर जाग गया. कानून को मद्देनज़र रख अगर बात करे तो अरब के रेतीले इलाके मक्का शहर में मदीने जंग जीतने के बाद ही पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ) और उनके लोगों की हुक़ूमत हो गयी थी लेकिन इस्लामी...

बस ट्रेंड मुद्दा ....

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ट्रेंड यही होना सबसे ज़्यादा मायने रखता है, और हो भी क्यों न इससे एक इमेज क्रिएट होती है, समाज की,देश की,राष्ट्रवाद की,राजनीति की लेकिन इस बार कुछ और हुआ है इस बार एक सच सामने आ गया है. इस बार एक लाश दूसरी लाश को ढो रही है,उसकी बेटी जी हाँ "बेटी बचाओ" वाली बेटी बिलखती रही .. 12 किमी तक एक लाश दूसरी लाश को घसीटती रही ,बेफिक्र रहिये में कोई भारी भरकम बातें नही लिखूंगा,न ही एक शानदार प्लेट बिरयानी खाने के बाद यहाँ ये लिखूंगा उस "लाश" मांझी को लाश उठाये देख मुझसे खाया नही गया, बात कुछ और है... असल में जो शो फेसबुक और ट्विटर पर चला उसके बारे में है सिर्फ इतनी छोटी है जी हाँ छोटी क्योंकि जब हमारे यहा कोई "नीच" एक "ऊँचे" के यहा पानी पीने की हैसियत नही रख पाता तो हम चुप हो जाते है "अरे जाने दे न" कह देते है तो किसी आदिवासी,गरीब,भूखे और एक बच्ची को बाप का अपनी टीबी से मरी बीवी की लाश को कन्धे पर रख कर 12 किमी छोटा ही है. लेकिन इससे भी संम्मानजनक बात ये है की वहा एक मीडियाकर्मी द्वारा वीडियो बना ली गयी क्योंकि वो शायद "देशहित" में हो....

शहनाई के "उस्ताद" बिस्मिल्लाह...

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"यहां गंगा है,यहा बाबा विश्वनाथ है,यह हमारे खानदान की कई पुश्तों ने शहनाई बजाई है, अब हम क्या करें मरते दम तक न तो शहनाई छूटेगी और न काशी"(नोबतखाने में इबादत) उस्ताद ज़िंदगी के ,उ...