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असदुद्दीन ओवैसी जिनकी राजनीति सबसे अलग है...

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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव और हरियाणा विधानसभा चुनावों के साथ बिहार की कई सीटों पर उपचुनाव भी हुए है,इन चुनावों ने एक राजनैतिक दल ने सबसे ज़्यादा चौंकाने वाले परिणाम दिया है,वो है असद्द्दीन ओवैसी की पार्टी मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन जिसने महाराष्ट्र विधानसभा में पिछले विधानसभा की तरह  2 सीट हासिल की है और कई सीटों पर दूसरे नंबर रही है और तो और इस दल ने बिहार की किशनगंज विधानसभा उपचुनाव सीट पर भी जीत हासिल कर वहां भी अपना खाता खोला है | असद्दुदीन ओवैसी अब आगे झारखंड विधानसभा चुनाव भी लड़ने की कोशिशों में है तो यहां यह सवाल उनसे पूछना बनता ही है की पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?   असद्दुदीन ओवैसी,इस राजनेता का नाम तो एक है लेकिन काम कई है,यह टीवी स्टूडियो  से लेकर जनसभाओं तक हमेशा अपने विरोधी राजनैतिक दलों पर आक्रामक रहते है और बात को तथ्यों के आधार पर रखते है और अपने बोलने की खूबी से जनता को अपनी तरफ खींचने की कुव्वत भी रखते है आज की राजनैतिक स्थिति में असद्दुदीन ओवैसी से यह सवाल करना लाज़मी ही हो जाता है की यह चाहते क्या है ?...

क्या है कांग्रेस की पॉलिटिक्स ?

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चुनाव आयोग ने देश की भविष्य की सरकार के चुने जाने की तारीखों का ऐलान कर दिया है,7 चरणों मे होने वाले इन चुनावों का परिणाम 23 मई को आएगा, और इसी के साथ यह बहस भी शुरू हो गई है कि सत्ता में कौन आएगा? तमाम सर्वे को गौर कर देखें तो भी क्या देश का विपक्ष राजनीतिक पिच पर बोलिंग करने की स्थिति में है? यानी 5 साल से सत्ता पर काबिज़ "बैट्समैन" नरेंद्र मोदी को आउट करने के लिए तैयार है? जो स्थिति विपक्ष और मुख्य तौर पर कहें तो कांग्रेस की है उसमे मौजूद बड़े बड़े नेता यह चाहते तो है कि नरेंद्र मोदी चुनाव हारें,मगर कैसे यह बताने से वो पीछे हट रहे है,मिसाल के तौर पर राहुल गांधी ने ऐलान कर दिया है कि वो "आप" से गठबंधन नही करेंगे,और अकेले 7 की सात सीटों पर चुनाव लड़ेंगे,राहुल गांधी ने शायद पुराने आंकड़े और मौजूदा हक़ीक़त पर गौर नही किया है,जिसमे उन्हें पिछले लोकसभा चुनावों और विधानसभा चुनावों में वहां ज़ीरो सीट मिली थी।इस बार भी बहुत हद तक कहा जा सकता है कि दिल्ली में कांग्रेस खाता भी न खोल पायें,यह तो दिल्ली की 7 सीट की बात है। उत्तर प्रदेश को देख लीजिए, वहां सपा और बसपा साथ...

मौके की नज़ाकत को समझते है अखिलेश यादव...

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बसपा सपा का गठबंधन उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिये फाइनल हो गया है,सपा जहाँ 37 सीटों पर चुनाव लड़ेगी,वही बसपा 38 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है,वही रालोद को 3 सीटें दे गई है,इतना ही नही आज ही एक खबर के अनुसार अखिलेश यादव ने कांग्रेस को 9+2 सीटों का ऑफ़र भी दिया है। इस खबर ने जैसे राजनीतिक हलके मे कोहराम मचा दिया है,क्योंकि इस "महागठबंधन" के फाइनल होने को स्थिति में वोटों का बिखराव खत्म हो जाएगा। इस "महागठबंधन" को अमली जामा पहनाने में जो सबसे ज़्यादा कोशिश की जा रही है वो अखिलेश यादव की है। अखिलेश यादव ने वक़्त की नज़ाक़त को बखूबी समझा है,वो जानते है और समझते है 2019 के लोकसभा चुनाव में हार का मतलब क्या हो सकता है। उन्हें पिछले तीन चुनावों से अच्छा प्रदर्शन न करने वाली बसपा को बराबर की सीटें दे दी है,और यदि कांग्रेस भी इस गठबंधन में आती है तो इस "महागठबंधन" से उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। लेकिन एक तबका ऐसा भी है जो यह कह रहा है कि अखिलेश गलत कर रहे है,उन्हें झुकना नही चाहिए,वो उत्तर प्रदेश में मज़बूत है,और अखिलेश यादव खुद ...

राहुल गांधी का "नेता" बन जाना ....

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2013 की बात है आज से लगभग 5 साल पहले की गोवा में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी जिसमे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित करते हुए,भाजपा ने अपने तुर्प का इक्का चल दिया था,और तब से लेकर तकरीबन 4 साल तक नरेंद्र मोदी ने वो करके दिखाया जो भारतीय राजनीतिक इतिहास में बहुत कम हुआ है,वह सत्ता के शिखर तक पहुंचे,प्रधानमंत्री बने और इतना ही नही लगातार राज्य-वार भी भाजपा को "अजय" साबित कर दिया । जिसमे "उत्तर प्रदेश", "हरियाणा" से लेकर राजस्थान,मध्य प्रदेश और देश के तकरीबन 19 राज्यों में सत्ता हासिल कराई और इसमें कोई दो राय नहीं है की हर जगह की जीत का श्रेय नरेंद्र मोदी "ब्रांड" ही को गया,और इसके सामने यानि "विपक्ष" में कौन था ? भाजपा की भाषा में कहे तो "पप्पू" राहुल गांधी बस लेकिन.. वक़्त बदलता है। अब ध्यान दीजिए मौजूदा स्थिति पर आज इस घटनाक्रम को यानी मोदी "ब्रांड" को 5 साल के लगभग समय हो गया है और आश्चर्यजनक बात यह है की ठीक पांच साल बाद ही राहुल गांधी को भाजपा के गठबंधन में मौजूद पार्टी शिवसेना कह रह...

क्या हमें फर्क पड़ना बन्द हो गया है.?

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समाज का निर्माण हम करते है,हमसे होता है,तो बड़ा सवाल यह है कि हम कैसा समाज बना रहे है? किस तरह बना रहे है? जहां मृत लोग पड़े है और हम इसमे "हिन्दू मुस्लिम" ढूंढ रहे है उसमें "भाजपा कांग्रेस ढूंढ रहे है क्यों? क्यों? क्यों? क्या यह बेरहम समाज का दौर है...? "पीपली लाइव" फ़िल्म के लगभग आखिर में एक सीन है जहाँ नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और महिला जर्नलिस्ट के बीच कुछ बताचीत हो रही है जहां नवाज़ुद्दीन उस किसान के मरने की बात कर रहें है जो रोज़ 15 से 12 रुपये कमाता था और एक दिन ज़्यादा मेहनत पड़ने की वजह से मर गया,वही दूसरी तरफ वो महिला जर्नलिस्ट ये बता रही है कि "पब्लिक नत्था में ज़्यादा इंटरस्टेड है" असल मे ये फ़िल्म बनी ही इस दृश्य के लिए है। जहाँ जिस सोसायटी में हम रह रहे है,वो सोसायटी हमे इसी तरह "मैनुफेक्चर" कर रही है,इसके लिए आप "मीडिया" को दोष दीजिये "माहौल" को दीजिये या खुद को मगर हम ऐसे हो चुके है कि तीन बच्चे भूख से मर जाये या कोई आदमी अपनी मरी हुई बीवी को अपने कंधे पर हॉस्पिटल से घर ले जाये हमें सिर्फ तब तक फर्क पड़ता है जब तक कि ...

सर सैयद डे की अहमियत...

आइए आज थोड़ा इतिहास का ज़िक्र करते है,जब ब्रिटिश हुकूमत उरूज पर थी,उनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नही हिलता था,पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक सिर्फ उनका और उनक...

#Metoo महज़ सवाल नही है यह आईना है...

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पत्रकारिता जगत,सिनेमा जगत से लेकर सियासत के गलियारों तक #metoo लिखकर सवाल उठने लगें है,आरोप लगाए जा रहे है सवाल यह है कि क्या यही हमारे समाज की हकीकत है? क्या यही हमारे समाज का "निर्माण" है? यह हो क्या रहा है? बहुत बारीक बात है समझने की यह हो क्या रहा है? क्यों हो रहा है? आखिर क्यों इतनी महिलाएं एकसाथ आवाज़ बुलंद कर रही है,क्या ज़रूरत है? बात सिर्फ इतनी सी है कि यह महज एक हैशटैग नही है यह "ज़ख्म" है,जिस तरह ज़ख्म कभी भी हरा हो सकता है,उस तरह यह बात भी हो रही है। यह भी हो सकता है की कुछ लोग इसे "सनसनीखेज" बना रहे है,इसे "पब्लिसिटी" की तरह इस्तेमाल कर रहे है,लेकिन बहुत बड़ा सवाल,और कलंक या यूं कह ले हमारे समाज के लिए बीमारी यह है कि अगर इन हज़ारों आवाज़ों में से,हज़ारों सवालों में से और इन "आरोपों" में से एक भी महज़ एक भी बात सही है तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? समाज की बेहतरी की बात हो या उसके निर्माण की बात हो तो तब यह सवाल ज़रूर उठता है कि इसके लिए "कानून" बहुत ज़रुरी है,लेकिन क्या हमारे पास उचित कानून है? चलिये एक वक्त को इस मुहिम को...

ओवैसी भारतीय राजनीति के " बैरिस्टर"

असदुद्दीन ओवैसी कोंन है? हीरो है ? विलेन है? नेता है? या "मसीहा" ? सवाल बहुत बड़ा है की आख़िर एक "मुस्लिम" नाम वाला नेता,राजनीतिक,आर्थिक, सामाजिक और विदेश मुद्दों पर मुखरता से बोलता है,बात करता है और "तथ्यात्मक" बाते करता है,जो भारतीय राजनीति में बहुत कम होता है। असदुद्दीन ओवैसी भारतीय राजनीति का वो चेहरा है जो "मुस्लिमों" के मुद्दे पर "इफ्तार पार्टी","मुशायरे" से हट कर "सच्चर कमिटी" की बात रखते है,वो "मुस्लिम आरक्षण" की बात करते है,और यही वजह है कि आज उन्हें "मुस्लिम नेता" जैसी उपाधि दी जा रही है,लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि सिर्फ "मुस्लिम नेता" क्यों? "नेता" क्यों नही? आज 70 सालों के राजनीतिक इतिहास में मुस्लिमों के नेता के तौर पर जो नेता उभरे है उनमे से अधिकतर वो थे जिन्होंने सेक्युलरिज़्म की बात की है,उसका ज़िक्र किया है और इसी बात पर सत्ता हासिल भी की है,लेकिन यह राजनीतिक दल तब सवालों के घेरे में आते है जब "साम्प्रदायिक दंगे" और "नरसंहार" समाज की ...

कांशीराम मुलायम से मायावती अखिलेश तक ....

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बाबरी मस्जिद राम मंदिर विवाद के दौर की बात है,बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी थी,चारों तरफ हाहाकार सा मचा हुआ था,राजनितिक स्थिति भी बेहतर नही थी,और बाबरी  मस्जिद ढहाए जाने के बाद बर्खास्त हो चुकी सरकार को दोबारा चुने जाने के लिए चुनाव होना था | भाजपा पूरी तेयारी में थी क्यूंकि उसके पास "राम मंदिर" का मुद्दा था और उसे लेकर वो आश्वस्त थी,ये उस वक़्त की वो पहेली थी जो उस वक़्त में किसी से भी हल नही हो पा रही थी क्यूंकि भाजपा की उग्र राजनीति अपने चरम पर थी और बाबरी मस्जिद के ढह जाने के बाद हालात अलग थे,उस वक़्त कांग्रेस से लेकर तमाम दल चुप थे | लेकिन एक "गठबंधन" ने जेसे भाजपा को चारों खाने चित कर दिया,ये गठबंधन था मुलायम सिंह यादव और काशीराम के बीच यानी सपा और बसपा के बीच,और कुल मिलाकर कहें तो पिछड़े,अति पिछड़े और अल्पसंख्क वोट एक जुट हो गये थे,और उसी का मामला ये बना की एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद भाजपा चुनाव में बहुमत लाने में असमर्थ रही,और बसपा की मदद से मुलायम सिंह यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में बनी,उस वक़्त एक विवादित नारा भी दिया गया जी था "मिले मुलायम कांशीराम हवा मे...

विरोध,फिल्म और बॉलीवुड

भारत बड़ा देश है अलग अलग लोग,अलग रीती रिवाज़ और अलग अलग मर्जियां और अलग अलग इतिहास आब इसी अलग अलग में सब अलग है इतिहास भी कब किसी ने किसी ने किसी को कहा हराया हो या कहा कोंन हारा हो ये सब बड़ा मिला जुला सा रहता है, अब ये देश जो है "भावनाओं" का देश है, यानी भारत में कब किसकी कहा और क्यों भावनाए आहत हो जाएँ,मालूम ही नही चलता,किसी बात से ,किसी किताब से और कब किस "बयान" से भावना आहत हो जाएँ मालूम नही चलता और अब तो बात फिल्मों तक आ गयी है | फिल्मे हमे जोडती है,हमे उनमे सब कुछ अपना सा लगता है ,ये हमे अलग अलग पहलुओं से रूबरू कराती है और यही बात है की उनकी अहमियत भी बहुत है लेकिन ये अहमियत जब शक के घेरें में आ जाती है जब ये "विवाद" में पड़ जाती है,नया नया विवाद है फिल्म "पद्मावत" का जिसका नाम पहले पद्मावती था जिसे तब्दील कर "पद्मावत" किया गया है,लेकिन विरोध है की शांत ही नही हो रहा है,एक तरफ करनी सेना है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का बयान है | गौरतलब है की मशहूर फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने ये फिल्म बनाई थी,लेकिन पिछले वर्ष दिसम्बर में रिलीज़ ह...

मंटो जो समाज को आईना दिखाता है ...

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मंटो जिसने "विभाजन" देखा,जिसने "इन्सान" को "इन्सान" के हाथो मरते देखा जिसने दो "कोमों" को बंटते हुए देखा और जिसने देखा की केसे "खून" की प्यास इन्सान ही को हो जाती है , ये सब मंटो ने देखा महसूस किया और उसने एक समाज,एक देश,एक कौम को "मजहब" के नाम दो टुकड़े टुकड़े होते देखा और देखा की केसे नफरतें बढ़ते बढ़ते इन्सान ही इन्सान के दुश्मन हो जातें है | ये सब मंटों ने देखा और अपनी बड़ी मगर कम उम्र में देखते देखते आज ही के दिन इस दुनिया को छोड़ कर चले गये | आज ज़िक्र हो रहा है "बदनाम" सआदत हसन मंटो की आज ही  के दिन वो दुनिया को छोड़ क्र चलें गयें थे | सआदत हसन मंटों की पैदाइश ब्रिटिश पंजाब में समराला में हुआ था,11 मई 1912 को पैदाइश पाने वाले मंटो ने बटोर रायटर नोवल,शोर्ट स्टोरीज़ और कई नाटक भी लिखे और मंटों का लिखा इस तरह इन्सान को इस तरह असर डालता था इस कदर की लोगों के दिलों दिमाग पर वो असर करता था और भी इससे उन पर "अश्लील" होने के मुकदमे तक चले |  अपनी जिंदगी को बिताया नही जिया और उसमे उन्होंने बहुत तकलीफें झेली क...

किताबें.

किताबे,पुस्तक और बुक्स इन तीनो ही शब्दों के मायने एक है लेकिन एक है "किताब" जो क़ुरान है,जो गीता है और गुरु ग्रन्थ साहिब है और दूसरी है "पुस्तक" जो किसी भी हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार और पाठक के मुंह से हम सुन सकतें है और तीसरी है "बुक" यानी "दी बुक ऑफ़ एलाई" बाइबिल | आपको लग रहा है ये तो सभी को पता है इसमें बताने वाली क्या बात है ? लेकिन है आप देखिये गिने,तोले और नपे शब्दों के मानिंद बनी और एक जगह कुछ पन्नो में किसी कवर के बीच मौजूद ये किताबे कितनी है जो हर धर्म,विचार और हिसं से लेकर अलग अलग जगहों पर मौजूद है और हमेशा रही है क्यूंकि किताबें ऐसी चीज़ है जो इन्सान को जिंदा रखती है | किताबें इन्सान को जिंदा रखती है इसका मतलब ये नही है उसमे एनर्जी है उनमे प्रोटीन है लेकिन ये किताबें ही है जो "इन्सान" को सलीका देती है ,वरना ऐसी क्या वजह है आज से 1400 साल पहले लिखी गयी एक किताब "क़ुरान" आज भी करोड़ों लोगों को ये बता रही है "तुम सभी इंसान एक ही माँ बाप की औलाद हो और तुममे कोई ऊंच नीच नही है" है न अद्भुत | यह किताब ही तो है ...

दीदी का जादू केसे छाया...

ममता बनर्जी एक करिश्माई नेता है और इस बात को होने में या करने में वक़्त लगता है इस वक़्त में स्ब्बसे ईमानदारी से और संघर्षशील होकर ज़मीनी स्तर पर काम करने की शुरुआत ममता बनर्जी ने की और उसी के बाद फर्श से अर्श तक का सफर किया है | इसे करने में ममता ने जो काम किया उसने ही उन्हें एक परिपक्व नेता बनाया आज उनके जन्मदिन पर उनकी इन चीजों को याद किया जाना ज़रूरी है |  यही बात तब अहम हो जाती है जब आप ज़मीनी संघर्ष कर रहें है | ममता को कुछ भी थाली में सजा नही मिला उन्होंने हासिल किया | ममता बनर्जी जो अपने उग्र और तेज़ तर्रार रवय्ये की वजह से बदनाम थी उसे उन्होंने कभी बदला नही और यही वजह रही की सरकारें और हालत बदलें मगर ममता नही,ममता बनर्जी ने 1998 में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और अच्छी शुरुआत के बाद ये दल कमज़ोर आने लगा और भाजपा के साथ और कभी कांग्रेस के साथ जा जाकर ममता कमज़ोर होती नजर आई और कई राजनितिक आंकलन करने वालों ने उनके खत्म होने की बात तक कह दी | लेकिन ममता ने मौका ढूँढा और वो उन्हें मिला भी गया | 30 साल सत्ता में गुज़ार चुकी सीपीआई ने अपनी नीतियों से हट कर ओद्योगिक घर...

"आप" ऐसे तो न थे ...

"आप" ऐसे तो न थे ... आम आदमी पार्टी ने बड़े असमंजस पर लगाम लगाकर अपने राज्यसभा के उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है . आम आदमी पार्टी के अलावा कोई भी पार्टी होती तो सोच लेते की कोई बात नही जो किया तो किया तो किया मगर "आप" से सवाल किया जाना अहम है | आप से बात करना ज़रूरी है क्यूंकि जो बात पार्टी सिद्धांत और आंदोलनों से होकर गुजरी हो और ऐसे वेसे ही किसी अनजान चेहरे को राज्यसभा भेज देगी और भेज देगी और जिन्हें नज़रंदाज़ करके ये किया गया तो ये तो हिला देने जेसा ही है | आप ने तीन नामों की घोषणा की है पहले है आप के दिग्गज नेता संजय सिंह जिनका नाम दिया जाना आखिर उन्होंने मेहनत बहुत की है लेकिन सवाल बाकी दो नामों पर है जिसमे एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता  की उम्मीदवारी तय कर दी है | इस ऐलान के साथ ही सवाल ये है की आखिर अंजान चेहरे को क्यों राज्यसभा भेजा गया? क्यों राज्यसभा जेसी अहम जगह पर पूर्व वरिष्ट पत्रकार आशुतोष,वरिष्ट नेता कुमार विश्वास को अनदेखा किया है | अब "आम आदमी पार्टी" से सवाल ये है की क्यूँ? वो ये बताएं की इतना बड़ा कदम केसे ? केसे वरिष्ट नेताओं को ...

राहुल गाँधी के नाम खत..

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आदरणीय राहुल गांधी जी,अध्यक्ष राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी सुपुत्र स्वर्गीय राजीव गांधी, प्रपौत्र इंदिरा गांधी सबसे पहले आपको कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की शुभकामनाएं, राहुल गांधी जी भारतीय राजनीति में आपका और आपकी पार्टी का हमेशा दबदबा रहा है लेकिन अब आप अपने सवा सौ साल के इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहें है,ये आपके लिए चिंता का विषय है लेकिन क्यों ये आपको पता है? राहुल गांधी जी एक परिंदा अगर उड़ना छोड़ दें और और शेर अगर शिकार करना छोड़ दें तो वो क्या करता है? आपको पता है? मुझे तो नही पता क्योंकि उसका खुद का भी पता नही रहता है वो कहा गयाऔर ये सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अपनी "महत्वता" खो चुका है,भूल चुका है।क्या यही स्थिति आपके साथ नही है? क्या आप देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय राजनीतिक दल नही है क्या आप "विपक्षी" दल नही है? तो आप ऐसा महसूस क्यों नही करा रहें है? सवाल बहुत प्रैक्टिकल है कि क्यों आप और आपकी पार्टी अपनी मूल विचारधारा से परे होकर "क्लोन" बनना चाह रही है? क्यों आप "सॉफ्ट हिंदुत्व" को महत्वता दे रहें है ? क्यों आप खुद को "ब...

हसरत मोहानी का "इंकिलाब"

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"इंकिलाब ज़िंदाबाद" जब ये नारा बोला जाता है तो तमाम आंदोलन और तमाम विरोध एक साथ सिर्फ एक धागे में पिरो दिए जाते है,और इस नारे के जनक का ही आज जन्मदिन है। आज मोलाना हसरत मोहानी जी का जन्मदिन है आज ही के दिन इस महान स्वंतत्रता सेनानी,पत्रकार और हिंदी ग़ज़ल कहने वाली अज़ीम शख्सियत की पैदाइश हुई थी। मोलाना हसरत मोहानी साहब का जन्म 1 जनवरी 1875 को उन्नाव के "मोहान" गांव (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। स्वन्त्रता की लड़ाई में अपने हर एक फन से देश की आज़ादी के लिए अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया और हर एक मौके पर देश के लिए उसकी आज़ादी के लिए हसरत मोहानी ने अपनी सारी उम्र गुज़ारी । मोलाना हसरत मोहानी का ताल्लुक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से रहा और वहां पर अंग्रेज़ी हुक़ूमत होने के बावजूद भी वहां भी आज़ादी की शमा जलाए रखी और इसी वजह से उन्हें तीन बार यूनिवर्सिटी से निकाला भी गया ।यहाँ से ही मोलाना ने बीए की डिग्री हासिल करि ।मोलाना हसरत मोहानी ने एक पत्रिका "उर्दुए मुअल्ला" भी निकाली और उसमें ही  तमाम मुद्दों पर जहां तमाम सियासी मुद्दों पर आज़ादी के मुद्दों पर लेख लिखें। ...

नरेंद्र मोदी और बनाम ?

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एक और पूरा साल बीत गया है और अगर और बचे दिनों को छोड़ दें तो लगभग चार साल का अरसा बीत गया है,चार साल पहले ही देश मे नई सरकार ने क़दम रखा था और ये सरकार प्रचंड बहुमत के साथ आई थी और इसक...

"ग़ालिब" का है अंदाज़े बयाँ और...

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पुरानी दिल्ली गली कासिम जान की तंग गलियों से निकलता रास्ता और उसमें लंबी टोपी सर पर लगा कर कमर को झुकाएं चलने वाले मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान जिनका तखल्लुस "ग़ालिब" था,और सारी दुनिया इन्हें "मिर्ज़ा ग़ालिब" के नाम से जानती है इनकी पैदाइश आज ही के दिन हुई थी।  "वो पूछते है हमसे की ग़ालिब कौन है अब तुम ही बतलाओ की बताएं क्या" मिर्ज़ा ग़ालिब की शख्सियत और उनकी पहचान को अगर उन्ही के शेर से बताया जाए तो यही शेर उनकी शख्सियत पर और उनके रुबाब भरे लहजे पर बिल्कुल सटीक बैठता है,मिर्ज़ा ग़ालिब की पैदाइश आज ही के दिन हुई,वो 1797 को उत्तर प्रदेश के आगरा में जन्मे जहां से वो दिल्ली आ गए। मिर्ज़ा ग़ालिब की शख्सियत उनकी शायरी ही से बयान होती है जिसमे दर्द है,रुमानियत है मोहब्बत है और बयान है हर एक चीज़ का जो उन्होंने महसूस की और हासिल की,फिर चाहे उनकी औलादो के इन्तेक़ाल की खबर हो या अपने हाल पर हो मिर्ज़ा ग़ालिब ने हर एक मौके पर शायरी की है। "बाज़ीचा ए अतफाल है दुनिए मेरे आगे  होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे" बाज़ीचा ए अतफाल यानी बच्चों के खेलने का मैदान...